#केस ९. “ ब्लडप्रेशर की गोली से छुटकारा ! “
चिकित्सा के व्यापारीकरण वाले इस युग में धंधा चलाने के लिये दो बातें बहुत जरुरी हो गयी है , या तो डर फैलादो या फिर दवाईयों का ‘व्यसन’ गले पड़वादो |
“ जोखिम नहीं लेना चाहता मैं दिल के मामले में वैधराज...
धड़कने मेरी थम सी गयी तो क्या करेंगे आप वैधराज...
एक ही तो गोली की है मुझे आदत...
हो जाने दो गर होते है कुछ साइड इफेक्ट्स...
जोखिम नहीं लेना चाहता मैं दिल के मामले में वैधराज !! ” - उच्च रक्तचाप का एक रुग्ण
ब्लडप्रेशर वाले रुग्णों की मन:स्थिति आजकल युं हो गयी है जैसे कि २०० साल पहेले हद्यरोग था ही नहीं , आयुर्वेद की असली ताकत का अंदाजा भी नहीं उन ‘दिलवालों’ को !! एलोपेथी की ‘सिर्फ़ बिटाकार्ड जैसी दवाई लेकर ही संतुष्ट है वो रुग्ण, जिससे ना ही हदय नाम का श्रेष्ठ यंत्र मजबूत होता है ना ही रक्तवाहिनियां तंदुरस्त होती है और ना ही उससे हदयरोग का मूल कारण दूर होता है | जबकि आयुर्वेद की औषधियों का काम एकदम विपरीत है |
जब मैंने बिटागार्ड के साइड इफेक्ट्स पढ़े तो मैं हैरान रह गया, अगर आप इस दवाई को ज्यादा लंबे समय तक लेते रहते है तो आप को ये तकलीफें हो सकती है जैसे कि “ शिरदर्द, लो ब्लडप्रेशर, आलस्य, चक्कर आना, साँस फूलना, थकान, स्नायुमें खिंचाव, मंदनाडी, धकधकी, निस्तब्धता, सूजन, दमा, अपचन, शरीर ठंडा पड़ जाना, तंद्रा, छातीमें दर्द, स्किन एलर्जी, नपुंसकता|”
और आश्चर्य की बात ये है की कुछ रुग्णों को तो पता भी नहीं होता कि उनके शरीर में बाकी सारी तकलीफें किस वजह से हो रही है, डॉक्टर्स उन्हें ये कहके बहला देते है की अब उमर हो गयी है तो ये तो सब होता रहता है , लो करलो बात अब रुग्ण ना रहे घर के ना रहे घाट के | इतने दुष्प्रभाव होने के बावजूद रुग्ण बिचारे डर और अज्ञान के कारण बिटागार्ड के व्यसन से मुक्त भी नही हो पाते, तो इस स्तिथि में एक सच्चे वैध्य का कर्तव्य है कि उन रुग्णों की मदद करे और उन्हें तंदुरस्त दिल के साथ सच्चे स्वास्थ्य का आनंद प्रदान करें |
एक तरफ कार्डियोलॉजीस्ट और एक तरफ आज के एक छोटे से आयुर्वेदिक वैध्य को बिठाया जाये तो हो शकता है तर्क-वितर्क और हदय तथा रक्तवाहिनियों की सूक्ष्म कार्यप्रणाली और सूक्ष्म रचना के मामले में वैध्य कम जानकर निकले पर इससे क्या होता है !! युद्धभूमि के नक्शे की जानकरी से ही सिर्फ़ थोड़ी युद्ध जीता जाता है , विजय के लिये सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है हथियारों की गुणवत्ता और उसके इस्तमाल का ज्ञान | आयुर्वेद के पास हदय के लिये औषधयोगों का भंडार है , वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य जानते ही थे की हदय शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है तो भला उस मामले में वो पीछे कैसे रह जाते | जरुरत है तो सिर्फ़ आज के वैद्य को हिम्मतपूर्वक ऐसे केस हैंडल करनेकी , बेशक सावधानी के साथ, आखिर दिल का मामला है भाई | अहमदाबादमें मैं एक वैधराज(एम.डी.-आयुर्वेदाचार्य) को जानता हूं जो ‘आयुर्वेदिक कार्डियोलोजीस्ट’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो हार्टकेअर के बड़े अस्पतालोंमें भी बड़े बड़े आधुनिक हद्यरोग निष्णातो की सहायता करते है वो भी मुश्किल इमरजंसी अवस्था में !! इस दिशा में और वैध्य भी शायद आगे बढ़ रहे हो उन्हें भी मेरा अभिनंदन | हद्यरोग के मेरे कुछ अनुभवों में से एक केस में बताता हु सुनिये...
जागृतिबेन व्यास
वय : ४५ वर्ष
पता : राधनपुर
व्यवसाय : शिक्षक
तारीख : ०१/०५/२००९
केस नं. र/०७५
“ ब्लडप्रेशर की एलोपेथी की गोली चालू होने के बावजूद उस दिन उनका बीपी था १५०/१०० mm/hg , साथ में तेज शिरदर्द, चक्कर आना, ग्रीवा शूल, शरीर की भीतरी जलन, अल्प श्वेत प्रदर, कभी कभी खट्टी उल्टी हो जाना, नींद की कमी और अल्प विबंध ये लक्षण भी जानने को मिले |
साथ में आये उनके पतिदेव कहने लगे “५ साल से दवाइयां कर कर के परेशान हो गया हु अब तो आपको ही ठीक करना है , इसका गुस्सा इतना है की जो भी हाथ में आता है उठा के बच्चो को मार देती है | डॉक्टरों का कहना है हमेशां के लिये इसका ठीक होना कठिन है | “
आयुर्वेद के हिसाब से इस केस में , पित्तवृद्धि की वजह से सिर और हदय की रक्त वाहिनियों में तनाव उत्पन्न होते रहता था और साथ में और भी लक्षण आते जाते रहते थे | मैंने १० दिन की आयुर्वेद औषधियाँ इस प्रकार दी...
१. सूतशेखर रस ( पित्तवृद्धि के साथ उच्च रक्तचाप में ये उत्तम औषधि है) > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
२. आमलकी रसायन वटी > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
३. गोदंती भस्म > १२५ मिलीग्राम दिन में दो बार गाय के घी और खड़ी शक्कर मिलाके
४. केप्सूल कार्डियोल-एच (बेक्फो फार्मास्यूटिकल्स की हाई बी.पी. के लिये पेटंट आयुर्वेद औषध) > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
“ ज्यादातर डॉक्टर्स हाई ब्लडप्रेशर में अज्ञानता वश रुग्ण का घी बंद करवा देता है, उन्हें पता होना चाहिए की घी अलग अलग प्रकार के होते है और गाय का घी हद्य को शक्ति प्रदान करता है , हमने कई रुग्णों को देशी गाय का शुद्ध घी चालु करवाया है जिससे उनको अत्यंत लाभ मिले है | बस इतना खयाल रखना है की आमावस्था और कफवृद्धि की अवस्था हो तबतक कोई भी घी नहीं देना है | इस केस में तो पित्त वृद्धि में घी बंद करवाया गया था - पथ्यापथ्य के मामले में कितना दरिद्र है ये आज का आधुनिक विज्ञान !! ”
....तारीख : १०/०५/२००९ को जब वापिस आये तो बाकी सब तकलीफों में ७०% तक फायदा हुआ था पर ग्रीवा शूल में फायदा नहीं मिल पाया और मुख्य बात ये हुई की बी.पी. हो गया १०५/८० mm/hg | अब साथ में एलोपेथी की बीटाकार्ड की जरुरत नहीं लगी मुझे इसलिए वो बंद करने का प्रयत्न करने को कहा गया , पर हर ३-४ दिन में बी.पी. चेक करवाने को कहा था और अगर जरुरत पड़े तो ही बीटाकार्ड लेने को कहा | अब १५ दिन के लिये परिवर्तित औषध योग ये दिया गया...
१. सूतशेखर रस > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
२. केप्सूल कार्डियोल-एच > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
३. *एकांगवीर रस (ग्रीवा शूल के लिये ) > २ गोली दिन में दो बार खाने के बाद
१५ दिन की दवाई खतम हो गई , उनको भ्रम हुआ कि सबकुछ ठीक हो गया है इसलिए मुझसे मिलने भी नहीं आये और सारी औषधियाँ भी बंद करदी | लेकिन ५ साल पुरानी तकलीफें इतनी आसानी से उनका पीछा थोड़ी छोड़नेवाली थी , पित्त का पहाड अभी तो टूटना शुरू ही हुआ था..चढान अभी बाकी थी | ता: १४/०६/२००९ को गर्मी के कारण रोग ने फिरसे करवत बदली और लक्षण में मिले विबंध और शिरदर्द...१५ दिन की औषधियाँ इस प्रकार दी..
१. त्रिफला आरग्वध वटी > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
२. केप्सूल कार्डियोल-एच > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
३. गोमूत्र हरीतकी > कब्ज के लिये > २ गोली दिन में दो बार खाने के बाद..
(*पित्त में गोमूत्र वाला औषध नहीं देनी चाहिए पर तब शायद उतावलेपन में या अज्ञानतावश ये भूल मुझसे हो गयी थी लेकिन साथ में दी गयी त्रिफला आरग्वध ने काम बिगड़ने नहीं दिया था )
ता: २७/०६/०९ को ग्रीवाशूल- अंसवेदना थे..और बी.पी. बिलकुल नोर्मल १३०/८० ..इस बार त्रिफला आरग्वध वटी और केप्सूल कार्डियोल-एच के साथ महारास्नादि घन वटी > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट लेने को बोला गया...१५ दिन के लिये..
ता: ११/०७/०९ को ग्रीवाशूल में फायदा था पर हल्का शिरदर्द था और बी.पी. १३०/९०... यंहा याद रहे बी.पी. के लिये कोई एलोपेथी दवाई चालु नहीं थी | नाडी वायु-पित्त प्रधान थी ...१५ दिन के लिये परिवर्तित योग इस प्रकार दिया ...
१. सूतशेखर रस > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
२. केप्सूल कार्डियोल-एच > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
३. पथ्यादी घन वटी (शिरदर्द के लिये) > २ गोली दिन में दो बार खाने के बाद
४. दशमूल क्वाथ > ताजा घर पे बनाकर २० मिली दिनमें दो बार खाली पेट
ता: २५/०७/०९ को संपूर्णलाभ था कोई तकलीफ नहीं थी ...१५ दिन के लिये फिर से वही औषधियों का पुनरावर्तन किया गया |
ता: १५/०८/०९ और कोई तकलीफ नहीं थी पर बारिश के कारण थोडा बुखार जैसा था...१५ दिन के लिये केप्सूल कार्डियोल-एच के साथ सुदर्शन घन वटी ( २ गोली दिन में दो से तीन बार जरुरत के हिसाब से ) दी थी |
ता: २३/०८/०९ को.. कोई तकलीफ नहीं थी रुग्ण भी खुश थे.. बी.पी. : १३०/९० था | अब फिर से कोई तकलीफ उत्पन्न ना हो इसलिए १५ दिन के लिये वही केप्सूल कार्डियोल-एच(सिर्फ़ सुबह नास्ते के बाद १ केप्सूल) के साथ सूतशेखर रस(२ बी.डी) लेने को बोला था |
इतनी औषधियां पूर्ण होने के बाद फिर से मुझसे पूछे बिना औषधियां बंद कर दी , उनको जैसे ब्लड प्रेशर बढ़ने का कोई डर ही नहीं था एक तरह से तो वो अच्छा ही था परंतु पथ्यापथ्य ज्ञान के अभाव से और वैध्य की आज्ञा के उलंघन से ऐसी व्याधियां फिर से जीवन में लौटती ही है |
उनके जीवन में भी साडे चार महीनें तो बिना कोई तकलीफ बिना कोई औषधि के हँसी-खुशी गुजर गये , परंतु ता: १८/०१/२०१० को बढ़े हुये ब्लड प्रेशर ने फिर से उनके दिल के दरवाजे पे दस्तक दी इस बार बी.पी था १६०/११० mm/hg और लक्षण थे = शिर:शूल, अति विबंध, वायु प्रतिलोमता और आनाह...मैंने कहा ”अब मुझसे बिना पूछे औषधियां बंद की तो अस्पताल में दाखिल करवा दूँगा “ जागृतिबेन ने अबसे कोई लापरवाही नहीं करने का वचन दिया खासकर उनके पति ने | औषधों का सिलसिला फिर से चालु हुआ...१५ दिन की औषधियां इस प्रकार थी..
१. गन्धर्व हरीतकी टेबलेट ( कब्ज के लिये ) > ४ गोली रात को सोते समय
२. महाशंख वटी ( गेस के लिये ) > २ गोली दिन में दो बार खाने के बाद चूसने के लिये
३. सूतशेखर रस > २ गोली दिन में दो बार खाली पेट
४. केप्सूल कार्डियोल-एच > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
ता: ०६/०२/२०१० को ब्लडप्रेशर में गिरावट तो हुयी – १४०/१०० के साथ हल्का शिरदर्द था और कोई तकलीफ नहीं थी ... कार्डियोल-एच और सूतशेखर रस का १ महीने के लिये पुनरावर्तन किया गया |
ता: ०५/०३/२०१० को बी.पी बिलकुल सामान्य था – १२०/८० और ना ही शिर दर्द था पर इस बार अम्ल-विदाही आहार और वसंतरुतु के मिलाप से नयी ताजा ताजा तकलीफ उत्पन्न हुयी- बढ़े हुये पित्त-कफ से चर्मविकार हुआ, पिछले पांच दिनों से त्वचा पे रक्तवर्ण की छोटी छोटी रेखाएं बन जाती और साथ में जलन और खुजली होती | निदान परिवर्जन के साथ १५ दिनों के लिये औषधयोग इसप्रकार दिया गया ...
१. निम्बादी चूर्ण > १ चम्मच दिन में दो बार खाली पेट
२. प्रुनिलोल कैप्सूल (एट्रीमेड फार्मा की पेटंट) > १ केप्सूल दिन में दो बार खाली पेट
३. क्यूटीस् ओइल (वासु फार्मा का ) > बाह्यप्रयोगार्थ
४. कार्डियोल-एच > १ केप्सूल दिन में दो बार खाने के बाद
१५ दिन बाद उनके पति ही आये थे मुझसे मिलने अब कोई तकलीफ शेष नहीं थी बी.पी. भी बिलकुल सामान्य था (बाहर चेक करवाया था) इसलिए सिर्फ़ कार्डियोल-एच लेने को बोला था वो भी सिर्फ सुबह १ बार नास्ते के बाद |
अब से हर बार उनके पति ही आते थे और १ महीने के लिये कार्डियोल-एच केप्सूल लेके जाते थे बीच में एक बार कमजोरी और अम्लपित्त के लिये रसायन टेबलेट, धात्री लोह और अर्जुनारिष्ट का भी प्रयोग किया था | रुग्ण ने अपनी हिम्मत से सारी तकलीफ़ो को परास्त कर दिया था आज अप्रैल’’२०१५ में भी कोई तकलीफ नहीं है उनको | और पिछले तीन सालों से कार्डियोल-एच केप्सूल भी नियमित रूप से नहीं लेते बस अपने पास रखते है, कभी कभी जरुरत पड़ने पर ले लेते है महीने-दो महीने में १ बार |
उनके पति मुझसे कहते रहते थे कि मेरा तो बहोत बड़ा काम हो गया आपके यंहा, मेरी पत्नी को वो हानिकारक ब्लडप्रेशर की गोली से छुटकारा मिल गया | हाल ही में खबर मिली थी की उनके पति को अचानक हार्ट ऐटेक आया था और एलोपेथी के बड़े अस्पताल में एडमिट किया गया, लाखों रुपये भी खर्च हो गये | अब तो हद्यरोग के लिये स्पेशियल आयुर्वेद के बड़े अस्पताल खुलने की राह देखिये मित्रो ! शायद कुछ हिम्मतवाले वैध्य इस पृथ्वी पर फिरसे सुव्यवस्थित धडकनों की ध्वनि का संगीत फैला भी दे |