#प्रश्न : कौनसी चिकित्सा सफल होती है ??
#प्रश्न : कौनसी चिकित्सा सफल होती है ??

# उत्तर : मित्रो ! अगर आपको या आपके किसी पहेचान वाले को कोई भी बीमारी है और अगर वो ठीक नहीं हो रही है ..और आपको लगता है की सिर्फ़ डॉक्टर्स या वैध्य बदलते रहने से एक न एक दिन बीमारी से मुक्ति मिलेगी – तो आप बिलकुल गलत सोच रहे है | आज में आपको ये नहीं बताने वाला की कौन सी बीमारी मेडिकल विज्ञान के हिसाब से साध्य या असाध्य है ! आज में आपको सिर्फ़ इतना बताना चाहता हूं की कोन सी चिकित्सा सफल होने की सम्भावना ज्यादा होती है ....
 आचार्य वाग्भटजी ने चिकित्सा को सफल करने वाले मुख्य चार स्तंभ बताये है |
१. उत्तम चिकित्सक
२. उत्तम गुणवत्तापूर्ण औषध
३. आज्ञाकारी रोगी
४. उत्तम परिचारक

- मित्रो ! आचार्य वाग्भटजी ने ये जो बाते बताई थी वो आज के युग में कैसे उपयोगी है वो में संक्षिप्त में बताना चाहूँगा ...

• मित्रो ! मैंने कुछ दिन पहेले चिकित्सक के जो गुण पहले बताये थे उस हिसाब से पहेले अपना चिकित्सक चुन लीजिए फिर अपने आप को पूर्णत: उस उत्तम चिकित्सक के हवाले कर दीजिये, जब तक वो आपको ना छोड़े तबतक आप उसे न छोड़ने का वचन दीजिये --- जिससे चिकित्सक बिमारी को जड़ से खतम करने के लिये अपना श्रेष्ठ प्रयास कर सके |

• और चिकित्सक उत्तम है तो जो वो देगा वो औषधि भी उत्तम ही होगी...इसिलिए वो अपने पास से जो औषध दे या फिर जिस कंपनी का लिखके दे वो ही कंपनी का औषध खरीदिये | पैसे सेहत से ज्यादा महत्व के कभी नहीं होते | ऐसा बिलकुल न सोचिये की इस कम्पनीमें से चिकित्सक को ज्यादा कमीशन मिलता होगा सिर्फ़ इसिलिए उस कंपनी की औषधि लिखी है | सारे चिकित्सक सिर्फ़ पैसो के लिये काम नहीं करते |

• पहेला काम तो आपने कर दिया की अपने आपको चिकित्सक को समर्पित कर दिया, चिकित्सक उत्तम दवाई और कुछ सुचनाऐ देगा ..आप वो पालन करेंगे तो ज्यादातर किस्सोमे रोग आसानी से ठीक हो भी जाता है | ..फिर भी अगर बीमारी मजबूत है जाने का नाम नहीं ले रही है तो आप उदास बिलकुल मत होना | ...इस परिस्थितिमें में आपको आचार्य चरक की एक बात बताना चांहूगा – “ कदाचित दैवयोगेन द्रष्टारिष्टोअपि जीवति | ”  - “ चिकित्सक और रोगी साथ मिलकर पुरुषार्थ करे तो कई बार दैव कृपा से , नजर के सामने मरता दिखने वाला रोगी भी जीवित हो उठता है | ” ईश्वर ना करे कभी आपके सामने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो पर अगर ऐसा हुआ तो अपने मन को शांत एवं स्वस्थ बनाइए यंहां सिर्फ दैव यानि भगवान ही आपकी मदद कर सकते है – इसिलिए चिकित्सा की सफलता के लिये पांचवा स्तंभ में ईश्वर को मानता हूँ | एसेमें अपने मन से रजोगुण और तमो गुण को निकाल कर सतत महामृतुन्जय मंत्र या वैध्य की सलाह से अन्य मंत्र का जप कीजिये, तप कीजिये  – आयुर्वेद में मंत्र चिकित्सा का विज्ञान प्राचीन काल में बहुत ही विकसित था | बहुत सारे मंत्रो का अलग अलग रोगों के लिये आयुर्वेद में वर्णन है-  हो सके तो कोई भी बीमारी में, औषध ग्रहण करने से पहेले.. मंत्र उच्चारण करने के बाद ही सम्मान पूर्वक औषध ग्रहण करना चाहिए , जिससे शरीर, मन और आत्मामें सकारात्मक उर्जा का संचार होगा और कम दवाई से आप जल्दी ठीक होंगे |

• और चिकित्सा की सफलता का सबसे अंतिम स्तंभ है परिचारक – चिकित्सक तो सिर्फ़ कुछ समय तक ही रुग्ण के पास रहेगा लेकिन परिचारक ही ऐसा व्यक्ति है जो ज्यादातर समय रोगी के पास गुजारेगा | परिचारक मतलब सिर्फ़ पैसे लेकर खयाल रखने वाली नर्स नहीं , उसके अपने संबधी और घरवाले भी परिचारक ही कहे जाते है | परिचारक रोगी के आसपास सम्पूर्णत : सकारात्मक वातावरण का निर्माण करे – रोगी से कभी रोग की भयानकता के बारे में बात न करे , हमेशां उसे बताते रहे की तुम जल्दी से सम्पूर्णत: स्वस्थ हो जायोगे | परिचारक रोगी से स्नेह करने वाला होना चाहिए , वैध्य की तरह पवित्र होना चाहिए , वैध्य की बातों को ध्यान पूर्वक सूनकर उस पर अमल करने वाला होना चाहिए मतलब अपने कार्य में कुशल होना चाहिए और विशिष्ट बुद्धि से युक्त होना चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में अपनी बुद्धि से रोगी का हित ही करें |

लेखक :
- वैध्य सुमित ठक्कर (B.A.M.S - P.G.P.P)

• #पुस्तक: “ || #अनिवार्यआयुर्वेद || ”  

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