#केस ८. “ आयुर्वेद सस्ता या मँहगा ?? “
“ जुखाम-खांसी-बुखार-अतिसार-उल्टी-छोटीसी चोट इत्यादि जैसी सामान्य बीमारी को लेकर ज्यादातर लोग मेरे कुछ बी.ऐ.एम.एस - डॉक्टर मित्रो के पास जाते है जो कि जनरल एलोपेथी चिकित्सा से उनको चुटकी बजाते ही आराम भी देते है और रोगी खुश हो जाते है ... दो दिन की दवाई के ज्यादातर ५० से १०० रूपये में | मेरा अनुमान है कि भारत में ९५% डॉक्टर्स बी.ऐ.एम.एस यानि कि आयुर्वेद की पढाई करके जनरल एलोपेथी चिकित्सा क्षेत्र से ही अपना गुजारा कर रहे है और वो भी सरकार से कोर्ट में लड़ झगडकर – कुछ अपना क्लिनिक चला रहे है और कुछ बड़े अस्पतालों में गर्व से असिस्टंट डॉक्टर बने फिर रहे है | “
...जब किसी कारणवश वही रोगीको कोई बड़ी बीमारी का सामना करना पड़ता है तो मेडिकल स्टोर और फेमिली फिजिशियन से लेकर सुपर स्पेशियालिस्ट और सर्जन तक की पूरी चेइन खतम करके घूम फिरके वो बिचारा रुग्ण थका हरा आखिर में किसी आयुर्वेदज्ञ की शरण में जाता है तब...
आयुर्वेद चिकित्सक की वही डिग्री देखता है ‘बी.ऐ.एम.एस’ और वही मामूली सा छोटा सा क्लिनिक और न ही आकर्षक इन्टीरियर डिज़ाइनिंग (कुछ अपवाद हो सकते है) | और दूसरी बात किसी बी.ऐ.एम.एस डॉक्टरने अपने नाम के आगे अगर वैध्य लिखा है तो लोकमानस में न जाने क्यों उसके मामूली ही होने के हीन खयाल फैले हुए होते है | और तीसरी बात लोगो को लगता है की आयुर्वेद वनस्पतियां तो ऐसे ही कंही गटर के किनारे या फ्री के जंगल में उग जाती होगी और उसीकी मुफ्त दवाई भी घर पे ही बन जाती होगी | इसी ३ वजह से वो सिर्फ़ वही ५०-१०० रुपये का खयाल लेकर ही जाते है वैध्य के पास ..पर जबकि बीमारी पुरानी होगी तो उसे जड़ से खतम करने के लिये वैध्य उन्हें पहले १०-१५ दिन की दवाई तो देगा ही ..बिल बनेगा ५०० से ६०० रुपयों का | अब रुग्ण को शोक लगेगा वो सोचेगा कि अरे ये थोड़ी बड़ा अस्पताल है तो इतना बिल ?? फिर उसी सोच की वजह से कई रुग्ण फोलो-अप ट्रीटमेंट के लिये भी नहीं जाते, कंहा वो ५०-१०० रुपये और कंहा ये ५००-६०० रुपये !!! बस अब दिमागमें भ्रम घुस गया की आयुर्वेद दवाईयाँ तो बड़ी मंहेगी होती है...
में मेरे इन सारे रुग्ण मित्रो के मानसपट से भ्रम तोड़ने के लिये सिर्फ़ इतना ही कहूँगा की आप किसी भी वैध्य की तुलना जनरल प्रेक्टिस करनेवाले बी.ऐ.एम.एस या एम.बी.बी.एस या बी.एच.एम.एस. से करना बंद कर दीजिये क्योंकि आप ज्यादातर सुपर स्पेशियलिस्ट से भी न ठीक हुयी बीमारी वैध्य के पास लेकर जाते है और वो उसको ठीक भी करता है | तो आपको वैध्य की फ़ीस की तुलना सुपर स्पेशियालिस्ट एम.डी और एम.एस. की फ़ीस के साथ करनी चाहिए फिर आप टोटल हिसाब करने पर पाएंगे कि ये वैध्यने तो आपकी बीमारी बहोत ही सस्ते में निपटा डाली ...वैध्य दिखनेमें छोटा जरुर लग सकता है परंतु वो काम तो आपका बड़ा ही करके देगा |
“ उनदिनों मेरे गाँव में शुद्ध आयुर्वेद चिकित्सा शुरू करने वाला मैं प्रथम वैध्य था जबकि एलोपेथी चिकित्सक शायद ५० से भी ऊपर थे | शुरूआती दिनोमें जंहा फेमिली फिजिशियन दवाईयों के ३०-४० रुपयें लेते थे वंही में २००-३०० रुपये लेता था तब गाँव में अफवाएं फ़ैल गयी कि ये वैध्य तो लुट मचा रहा है, लेकिन जब लोगोंको स्थायी रूपसे चमत्कारीक परिणाम मिलने शुरू हो गए तो मेरी गाड़ी आगे चलनी शुरू हुई | फिर लोगों को समजमें आना शुरू हुआ कि बड़ी बिमारियों में एलोपेथी फेमिली फिजिशियन तो थोड़े समय की राहत के लिये १-२ दिन की दवाई के ३०-४० रूपये ले लेता था जबकि दूसरी और में तो रोग को जड़ से हमेशां के लिये ठीक करने के लिये १५ दिन कि दवाई के २००-३०० रुपये लेता था | और फिर आयुर्वेद प्रेमी लोगों का बाहर शहर में बड़े अस्पतालोंमें जाके चिकित्सा लेना भी कुछ हद तक कम हो गया और इस तरह उनके बहोत सारे रुपये भी बचने लगे तब जाके उन्हें समज आया कि आयुर्वेद कितना सस्ता है | परिवर्तन से समायोजन बनाने में कुछ समय तो लग ही जाता है | मैंने मेरा मुख्य क्लिनिक भले ही अहमदाबाद में बनाया हुआ है लेकिन ये समायोजन आज सात साल के बात भी टिका हुआ है , में महीने में ६ दिन आज भी मेरे गाँव के क्लिनिक में ही बिताता हूँ | “
बस एक बार आयुर्वेद की राह पे चले और स्वास्थ्य की मंजिल पाकर ही दम लें , फिर देखिये आपके जीवन में स्वास्थ्य के संगीत की आनंदमय बाँसुरी के सूर कैसे बहने लगते है | इस बात को ज्यादा सुचारू रूप से स्पष्ट करने के लिये में अपने अनुभवों से अगर एक केस बताऊ तो आपकी द्रष्टि के सामने सत्य अपने आप ही प्रकट हो उठेगा...सुनिये...
रुग्ण नाम : अल्पेश प्रजापति
व्यवसाय: नौकरी
उम्र : २५ वर्ष
तारीख: ?
केस नं. ?
पता : नारणपुरा-अहमदाबाद, गुजरात, भारत
“ अल्पेश को बार बार मूत्राशय की पथरी परेशान कर रही थी, दर्द इतना हो रहा था जैसे किसी महिला को बच्चे की डिलीवरी के समय होता है , मेरे पास आया तब किसी एलोपेथी चिकित्सक से पेइन किलर इंजेक्शन लेकर आया था दर्द में अस्थायी रूप से राहत मिल चुकी थी |
मैंने सोनोग्राफी रिपोर्ट्स देखे, मूत्राशय में १०.५ मिलीमीटर की १ पथरी और साथमें कुछ छोटे छोटे कण भी थे | मैंने कहा अभी १५ दिन की दवाई लेकर जाओ पथरी तो आयुर्वेद औषध लिये बिना निकलना असंभव है और ऑपरेशन की भी जरुरत नहीं है | मैंने १५ दिन की दवाई के ६५०/- रुपये बोले , सुनकर सोचने लगा कि अभी तो उस बी.ऐ.एम.एस. डॉक्टर ने ५० रुपये में ही चमत्कार दिखा दिया ये क्या नया करेंगे ! मुझसे बाद में आने के लिये कहकर गया |
पथरी में जब दर्द की मौजूदगी नहीं होती तो रुग्ण उसे भूल जाते है जैसे की एक बुरे सपने को, लेकिन भाई मेरे ये हकीकत है कि तेरे शरीर में अश्मरी पड़ी है | लेकिन जब वो हिलना शुरू करती है तो फिरसे नानी याद आ जाती है | १ महीने बाद अल्पेश के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, फिर किसीके कहने पे गया किसी नेफ्रोलोजिस्ट के पास | उन्होंने ऑपरेशन के अलावा और कोई विकल्प नहीं है कह दिया अब साइज़ बढ़कर १२ मिलीमीटर हुई थी , खर्च बताया करीब १५०००/- रुपये | डॉक्टर ने एडमिट होने के लिये कह दिया | पैसे खोने के साथ परेशानी भी होनेवाले थी, डर लगना शुरू हो गया तभी उसे अचानक मेरी याद आयी - प्यार से तो ना सही डर से ही लोग हम आयुर्वेद वालो को याद जरुर कर लेते है |
किसी तरह अस्पताल से भागकर मेरे पास आ गया और कहने लगा साहब कुछ भी करके मेरी पथरी निकाल दीजिये , मैंने कहा ‘’ मैंने तो कभी मना किया ही नहीं था , १५ मिलीमीटर तक के मूत्रवह संस्थान में कहीं पे भी छिपे स्टोन तो आसानी से निकल जाते है आयुर्वेद की शक्ति से | “ मेरी बातों से उसका मन थोडा चिंता मुक्त हुआ और खुशी खुशी १५ दिन की दवाई के ६५०/- रुपये देकर गया |
औषधियाँ इस प्रकार थी..
१. गोक्षुरादि गुग्गुलु – २ गोली दिनमे दो बार भोजन से पहेले
२. पुनर्नवादी गुग्गुलु - २ गोली दिनमे दो बार भोजन से पहेले
३. कैल्सिपिक टेबलेट ( गोस्वामी ड्रग्स फार्मा की पेटंट ) - २ गोली दिनमे दो बार भोजन से पहेले
४. मिश्रण ( गोक्षुर चूर्ण ६० ग्राम + पाषाणभेद चूर्ण ३० ग्राम + श्वेत पर्पटी १० ग्राम + यवक्षार १० ग्राम + संगेयहुद भस्म १० ग्राम ) – ४ -४ ग्राम दिनमे दो बार भोजन से पहेले , निम्बू सरबत के साथ
..पांच दिन बाद अल्पेश आया मेरे क्लिनिक पे चहेरे पे खुशियों का पर्वत और हाथ में दर्द का पत्थर था – वही १२ मिलीमीटर का..
“ में भी अपना आश्चर्य रोक नहीं पाया, आयुर्वेद से चमत्कार होते है मेरे कानो को तो पता ही था पर आज मेरी आँखों को भी सबूत मिल गया | ”
लेकिन खुशी के साथ मैने चेतावनी भी दे डाली “ अभी १५ दिन का वो कोर्स खतम कर दो वर्ना पथरी दोबारा हो शकती है और बाद में भी हररोज ३ से ४ लीटर शुद्ध पानी पीते रहना और जरुरत लगे तो कभी भी फिर से दिखा जाना “
उसने जवाब में सिर्फ़ इतना ही कहा ‘ आप तो मेरे भगवान है मेरे १४३५० रुपये बचा लिये और बार बार होते अत्यतं दर्द से भी छुटकारा दिला दिया ’
“ भगवान मैं नहीं मेरे अंदर का आयुर्वेद है, जो स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने इस पृथ्वी के सारे प्राणियों के स्वास्थ्य हेतु रचाया था |”
फिर बहोत बार अल्पेश मेरे यंहा आने लगा अपने लिये नहीं पर समाजसेवा के लिये और उसकी वजह से बहोत सारे पथरी से पीड़ित रुग्णों के आशीर्वाद पाने का मुझे अवसर मिला |
ऐसे तो कई वर्षोंसे से कई सारे रुग्णों के बहोत सारे पैसे आयुर्वेद से बचे है मेरे यंहा भी और मेरे वैध्य मित्रो के यंहा भी !! और सुनिये, इनमें से ९०% ऑपरेशन्स आज सिर्फ़ बड़े अस्पतालों के खर्चे चलाने के लिये और इ.एम.आई. भरने के लिये हो रहे है :- घुटनों के ऑपरेशन, स्पाइन के ऑपरेशन , प्रोस्टेट के ऑपरेशन, एपेंडिक्स , अल्सरेटिव कोलाइटिस, हदय रोग की बाय पास सर्जरी, गर्भाशय का निष्काशन, पी.सी.ओ.डी. में ड्रिलिंग , सिज़ेरियन, टोन्सीलेक्टोमी, सायनुसायटीस सर्जरी, किडनी स्टोन सर्जरी, गोल ब्लेडर सर्जरी , पाइल्स-फीसर और न जाने क्या क्या | आम आदमी बेचारा क्या करे या तो डर के मारे या फिर मेडिक्लेम कम्पनीयों की महेरबानी के मारे अस्पतालों के चक्रव्यूह से छुटकारा नहीं पा सकता |
“मँहगे आयुर्वेद का भ्रम इसलिए भी फैला हुआ है क्योंकि आयुर्वेद औषधों और एलोपेथी दवाइयों की तुलना भी गलत ढंगसे की जा रही है |” मेरे एक रुग्ण ने मुझसे पूछा की आपकी आयुर्वेद दवाईयाँ मंहेगी क्यों होती है? सामने मैंने भी एक प्रश्न पूछ डाला, “ आप के घर में अगर टूट-फूट हुई पड़ी हो, गंदकी फैली हो और उसकी वजह से मच्छर परेशान कर रहे हो तो आप क्या करेंगे ?
विकल्प (अ) सिर्फ़ काले हिट से मच्छरों को ही मारते रहेंगे सालोंसाल तक...या
विकल्प (ब) पुरे घर की अच्छे तरीके से साफ-सफाई करके फिर टुटा-फूटा समान रिपेर करवाएंगे ताकि मच्छर अपने आप ही चले जाये
उन्होंने कहा “ वैध्यराज आप भी क्या मजाक कर रहे है , नि:संदेह में दूसरा विकल्प ही पसंद करूँगा | “
मैंने कहा “मजाक मैं नहीं ये पूरा एलोपेथी दवाईयों का मार्केट आपके साथ कर रहा है , वो सिर्फ़ विकल्प (अ) ही आपके सामने रखता है | फिर आप ही सोचिये की शरीर के सिर्फ़ कीटाणु मारने में ज्यादा खर्च आयेगा या शरीर की साफ-सफाई और बिगड़े अंगों को दुरस्त करनेमें | हमारी आयुर्वेद औषधियाँ आपके सामने विकल्प (ब) ही रखती है जिससे पहली नजर में देखने में आपको बेशक ये औषधियाँ मंहेगी ही लगेगी परंतु यही आपके लिये उचित होगा | ज्यादा समय मच्छरों को मारने में बर्बाद कर दोगे तो पूरा घर गंदकी का बाजार बन जायेगा | फिर जब सर्जन के पास जाना पड़ेगा तब पता चलेगा कि मंहेगा कौन है |
उदाहरण के तौर पे, “जुखाम में सिर्फ़ बेक्टेरिया को मारने के लिये एलोपेथी में एंटीबायोटिक और साथ में एंटीहिस्टामिन, कफसप्रेसंट, ऐक्स्पेक्टोरंट इत्यादि दिए जाते है जिससे पहले तो आराम मिलता है पर ये जुखाम नामक दरिंदा कई रुग्णों के पीछे तो हाथ धोके पड जाता है, १२ महीनों में से १० महीने तो जुखाम रहता ही है | आपने २० साल पुराने जुखाम भी नहीं देखें है क्या ! आयुर्वेद औषधियाँ रुग्ण के पुराने जमा दोषों को शरीरसे निकालने के साथ फेफड़ों और नाक की रोग प्रतिरोधकता एकदम मजबूत कर देती है जिससे रुग्ण को स्थायी रूपसे ‘जुखाम मुक्ति’ मिलती है |”
और एक उदाहरण सुनिये, “ डायबिटीस में एलोपेथी की दवाई ‘मेटफोर्मिन’ या ‘ग्लिपिझाइड’ का काम इतना ही है की वो लीवर के कोषो को ब्लोक करती है ताकि सुगर ना बने | वंही दूसरी और आयुर्वेद औषध ‘आरोग्यवर्धिनी वटी’ या ‘प्रमेह गजकेसरी रस’ या ‘चंद्रप्रभा वटी’ या ‘रसायण चूर्ण’ का काम यह है की वे सब लीवर, स्वादुपिंड और किडनी सबको रिपेर करती है ताकि भविष्य में शरीर को किसी बाहरी दवाई की जरुरत ही ना पड़े सुगर कन्ट्रोल के लिये और मुख्य बात यह है कि ये औषधियाँ डायबिटीस से होने वाली शरीर की बाकी तकलीफें जैसे की कमजोरी, कोलेस्ट्रोल, मोतियाबिंद, किडनी फेइलर, ब्लडप्रेशर, सेक्सुअल डिफेक्ट, हाथ-पैरों का सूनापन, घावों का ना भरना इत्यादि से भी शरीर की रक्षा करती है जबकि एलोपेथी में ऐसी कोई पूर्वनियोजित व्यवस्था नहीं है | एलोपेथी वाले डायबिटीस को सभी रोगों का प्लेटफोर्म समजते है, इसलिए डर भी ज्यादा फैला रखा है उन्होंने | आयुर्वेद में तो अगर डायबिटीस एक साल से ज्यादा पुराना ना हो और अनुवांशिक ना हो तो वह बिलकुल साध्य माना गया है , मतलब पूरा जीवन दवाईयां खाने की कोई जरुरत ही नहीं, और अगर पुराना भी हो तो डायबिटीस से होने वाली सभी तकलीफों के लिये हररोज परेशानी भी नहीं उठानी पड़ेगी, सब के लिये अलग अलग एलोपेथी दवाईयाँ भी नहीं लेनी पड़ेगी | ” इतना समजाने के बाद वह रुग्ण के नेत्रों के सामने पड़ा रेशमी परदे का आवरण हटा और सत्य का प्रकाश दिमाग में प्रवेशित हुआ |
यह सिद्धान्त शरीर के बाकी सभी छोटे-मोटे रोगों में भी वैसे ही लागु होता है, आगे किडनी स्टोन वाला सच्चा किस्सा तो मैंने आपको पहले ही कह दिया है | और भी सुनिये आयुर्वेद की कृपा...मेरे कुछ ही अनुभव...
“ २ लाख की स्पाइन सर्जरी भी जन्हाँ निष्फल रही , वंहा मेरे आयुर्वेद का सिर्फ़ ५ हजार रुपयों का कोर्स ही कमरदर्द को हमेशां के लिये मिटाने में सफल रहा है “
“५ लाख रुपये पानी की तरह बहाने के बाद भी संतानप्राप्ति में निष्फल दंपति को, सिर्फ़ ३ हजार रूपये में संतति सुख प्राप्त हुआ है”
”४ लाख रुपयों से भी ठीक नहीं होने वाली १०-२० साल पुरानी एसिडिटी, सिर्फ़ १० हजार रुपयों में ठीक हुई है“
“१.५ लाख से भी ठीक नहीं होने वाला पुनरावर्तित पेटदर्द, सिर्फ़ ३ हजार में ही पलायन हो चूका है”
“१ लाख खर्चने के बाद भी साथ नहीं छोड़ने वाला ५ साल पुराना सोरियासिस, सिर्फ़ ९ हजार रुपयों में विदाई ले चूका है”
“ ५० हजार की बर्बादी के बाद भी परेशान करने वाला साइनस-जुखाम, सिर्फ़ १ हजार रुपयें में ही शांत हो चुका है”
“ ६० हजार लुटाने के बाद भी दर्द देने वाला माइग्रेन सिर्फ़ ५ हजार रुपयें में ही रुग्ण के सिर से समाप्त हो चुका है” इत्यादि...
एक और कारण यह भी है मंहेगे आयुर्वेद का भ्रम फैलने का , “शायद कुछ लोगो को कंही पे दोनम्बरी बिना डिग्री के वैध्य के पास खराब अनुभव मिला हो शकता है | “ सड़क के किनारे ‘हिमालयी खानदानी दवाखाना’ का बोर्ड तो कभी सबकी नजरमें आया ही होगा वो तम्बू वाले और घर-घर घूमते-फिरते ‘छ्द्म्चर वैध्यो’ को भी शायद आपने कभी देखा होगा हाथ में जड़ीबूटियों का थैला लेके और कुछ तो इससे भी आगे निकल चुके है जो आयुर्वेद का क्लिनिक तक खोलकर बैठ गए है – सिर्फ़ १५-२० औषधियों का और ५-७ रोगों का नाम जानकर, भला हो इस देश वासियों का | “ एक नादान युवक मेरे मार्गदर्शन कक्ष में आकर मुझसे कहने लगा आपके आयुर्वेद वाले तो लूट मचा रहे है , ये देखो पांच हजार रूपयें का चूर्ण जो में वो तम्बू वाले हिमालय के वैध्य के पास से लाया था उसकी गारंटी के बावजूद मेरी तकलीफ में तो कोई फर्क नहीं पड़ा |” मैंने आराम से उसे बिठाया समजाया कि भाई अब आयुर्वेद ऐसे रास्ते पे नहीं बिकता ये तो कुछ लालची लोगों की हलकी साजिशें है जिसमें आप जैसे भोले भाले युवक फसते है | और उसके फसने की मुख्य वजह थी उसका ‘गुप्तरोग’, ऐसी तकलीफो वाले युवको की तो राह तकते ही बैठे होते है ये बन बैठे फ्रोड वैद्य , स्वर्ण-रजत भस्मों और मूसली की बाते करते है और थमा देते है सड़े हुये पुराने अश्वगंधा के मूल !!! फिर उस युवक को सिर्फ़ १०० रुपये के कौचा चूर्ण से लाभ मिल पाया था |
मैंने सुना है की दो घूमते-फिरते फ्रोड वैध्योने एक पैसोंवाली बेबस माँ को ३० हजार रुपये का चूना लगाया , उनकी बेटी अपाहिज थी इसलिए ‘गारंटी’ शब्द की लालच में आ गयी , फिर पता चला जूठी स्वर्ण-मोती युक्त दवाईयाँ और जुठे वादे और जुठे फोन नम्बर्स | काश स्वास्थ्य ख़रीदा जा सकता... कमसे कम धनिक लोग तो बीमार नहीं होते !!! मेरे भोले देश वासियों थोडा इधर-उधर महेनत करके सच्चे डिग्री वाले वैध्य को खोजकर उनसे से ही चिकित्सा लें , चिकित्सोत्तम आचार्य चरक तो यंहा तक कहते है की ऐसे ‘छद्म्चर’-फ्रोड चिकित्सक से चिकित्सा करवाने से अच्छा है रुग्ण खुद ही आत्महत्या कर ले |
मित्रो ! आज के इस कलियुग में आयुर्वेद रूपी अमृत हमें प्राप्त हो रहा है क्या उतना ही पर्याप्त नहीं है ? फिर क्या सस्ता क्या मंहेगा ! सस्ता तो जहर भी मिलता है तो क्या कोई उसे भी खा लेगा ???
*नोंध : कुछ सरकारी अस्पतालोंमें कुछ आयुर्वेद औषधियाँ बिलकुल मुफ्त भी मिल जाती है, जो गरीब रुग्णों के लिये अच्छा विकल्प हो सकता है |